प्रयागराज हाईकोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि: बालिग जोड़ों की शादी में दखल नहीं दे सकती पुलिस, एफआईआर किया रद्द

प्रयागराज|25 अप्रैल 2026
बालिग जोड़ों की शादी में दखल नहीं दे सकती पुलिस, एफआईआर किया रद्द

प्रयागराज हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को यह बताने का अधिकार किसी के पास नहीं है कि वह किससे शादी करे या किसके साथ रहे। यह पूरी तरह उसका व्यक्तिगत और मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बालिग जोड़ों के वैवाहिक जीवन में पुलिस का हस्तक्षेप पूरी तरह अनुचित है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने सहारनपुर में दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया।

मामले की सुनवाई जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग को अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। वह जहां चाहे रह सकता है। जिससे चाहे शादी कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता।

पुलिस की कार्यप्रणाली पर जताई नाराजगी

कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर नाराजगी जताई। कहा कि आजकल एक ट्रेंड बन गया है, जहां पुलिस जोड़ों का पीछा करती है। उनकी शादी की जांच करती है। यह पूरी तरह गलत है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस के पास पहले से ही गंभीर अपराधों की जांच का भारी बोझ है। ऐसे में गैरजरूरी मामलों में समय और संसाधन खर्च करना सही नहीं है। यह पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

एफआईआर हुई रद्द

यह मामला सहारनपुर के थाना सदर बाजार से जुड़ा है। यहां एक पिता ने अपनी बेटी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। कोर्ट ने पाया कि लड़की बालिग है। उसकी उम्र 18 साल 11 महीने थी। इसकी पुष्टि हाईस्कूल सर्टिफिकेट से भी हुई। कोर्ट ने कहा कि जब लड़की अपनी मर्जी से शादी करके पति के साथ गई है तो यह कोई अपराध नहीं है।

मंदिर में हुई थी शादी

कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि दोनों ने 10 दिसंबर 2025 को देहरादून के एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की थी। यह शादी आपसी सहमति से हुई थी। इसमें किसी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं थी। ऐसे में पुलिस द्वारा इस मामले को अपराध मानना पूरी तरह गलत था। कोर्ट ने कहा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।

गुमशुदगी तक सीमित रह सकता था मामला

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर पिता को चिंता थी तो वह गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा सकते थे। लेकिन पुलिस ने इसे संज्ञेय अपराध मान लिया। इसके बाद जोड़े का पीछा किया गया। कोर्ट ने इसे अवैध करार दिया। कहा कि यह कार्रवाई कानून के दायरे से बाहर है। इससे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है।

अधिकारियों को दिए सख्त निर्देश

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सीनियर अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने को कहा गया है। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेट को आदेश दिया गया कि वह पुलिस डायरी में लाल स्याही से इस एफआईआर के रद्द होने की एंट्री सुनिश्चित करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसे मामलों में सतर्कता बरती जाए।

दंपती के जीवन में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी इस दंपती के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में बाधा न डाले। यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में समाज और प्रशासन दोनों को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

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